Tuesday, August 4, 2009

उनकी बहादुरी का भुगतान क्या करेगा कोई, उनकी शहादत का कर्ज देश पर उधार है....

एक सैनिक की चिट्टी आई, एक सैनिक की चिट्टी !
एक सैनिक की चिट्टी आई आज उसके गाँव में,
जैसे धुप उजाला लेके पहुँच गई वो छांव में!

माँ ने दौड़ के ले ली चिट्टी, जब की नहीं थी पढ़ी लिखी,
बोली कोई पढ़ के सुनाओ बेटा तो नहीं है दुखी
बचपन में जब पड़ता था जरा से गिले बिस्तर में,
माँ गिले में सो जाती थी उस बच्चे के चक्कर में!

जाने कितनी ठंडक होगी उस बर्फीली घाटी में,
जाने कैसे सोता होगा लाल मेरा वो माटी में!
इतनी जल्दी चला गया वो दे न सकी कुछ भी उसको,
बस खडी देखती रही एकटक उसको,

तेरा कुशलता जान में लेती, मन दिल को समझता है
जब तेरे हिस्से का खाना रोज़ रोज़ बच जाता है

सारा गाँव हाल युद्घ का जब हमको बतलाता है,
तेरी बढ़ाई सुन सुन के सीना चौडा हो जाता है

पढ़ने को जब चिट्टी खोली, गम का कोई तूफान चला
ऐसी खबर लिखी थी उसमे उसको पड़ता कौन भला,
सब के चहरे धुँआ धुँआ थे जैसे दिल हो कोई जला!

तभी अचानक एक पडौसन ने उसको बतलाया,
चीख उठी वो ममता पागल हाल ने था उसको बहकाया,

कुछ नहीं समझ पाई वो बहीन बहुत छोटी थी,
राखी उसने खुद ही बनाई और बक्से में छिपा दिया,
बोली जब पहना दूंगी कितने खुश होंगे भैया,
उसकी ये सारी बाते उसकी गुडिया से ही होती थी!

उसे देखा वो बूढी माँ फूट फूट के रोटी थी,
सोचती थी कैसे कह दूं तेरे सपने कभी नहीं सँवर पाएंगे
अब तुझसे राखी बंधवाने तेरे भैया कभी नहीं आयेंगे
तेरे भैया कभी नहीं आयेंगे ! तेरे भैया कभी नहीं आयेंगे !!!